बनता बुनियादी ढांचा, बनते मुनाफे
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बनना बुनियादी ढांचा, बनते मुनाफे
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आलोक पुराणिक
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देश बन रहा है। मतलब अगर पुलों, सड़कों, राजमार्गों का बनना देश का बनना है, तो देश तेजी से बन रहा है।
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देश बनाने की इस किस्म की गतिविधियां साठ के दशक में देखी गयी थीं। आज जितने बड़े बांध, बड़ी परियोजनाएं दिखायी पड़ती हैं, उनकी नींव कहीं न कहीं साठ के दशक में रखी गयी थी। आर्थिक उदारीकरण के बाद बुनियादी ढांचे का विकास एक नये महत्व का मसला हो गया है। विदेशी निवेश लाने से पहले निवेशक शर्त लगा रहे हैं कि भारत का बुनियादी ढांचा बेहतर होना चाहिए। मतलब सड़कें बेहतर होनी चाहिए। बिजली की स्थिति बेहतर होनी चाहिए। इस स्थिति में उन कंपनियों की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है जो किसी न किसी तरह से बुनियादी ढांचे के किसी कारोबार से जुड़ी हुई हैं। पिछले कुछ सालों में बुनियादी ढांचे के विकास के माडल में बहुत बदलाव हुआ है। एक दौर था, जब सड़क, बाँध, पुल बनाने की जिम्मेदारी सरकार की मानी जाती थी।
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अब ऐसा नहीं है। सरकार के पास संसाधनों का टोटा है।
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सो नये –नये माडल विकसित हो रहे हैं, निजी क्षेत्र की मदद बुनियादी ढांचे के विकास में ली जा रही है। और तो और प्रयोक्ताओं से ही पैसे वसूले जा रहे हैं। दिल्ली के करीब नोएडा को आश्रम से जोड़ने वाला नोएडा टोल पुल इस बात का नमूना है। इस पर जाने वाले यात्रियों को रकम ढीली करनी पड़ती है। इस कंपनी ने पब्लिक से पैसा लिया है। अब मुनाफे कमा कर अपने निवेशकों को लाभ पहुंचाना इस कंपनी का नैतिक कर्तव्य है। नोएडा टोल ब्रिज कंपनी बुनियादी ढांचे के नये बनते माडल का एक नमूना है। जो पुराने माडल से एकदम अलग है। यह पुल किसी आम सरकारी पुल की तरह नहीं है। इसे जो कंपनी चलाती है, उसकी जिम्मेदारी अपने शेयरधारकों के प्रति बनती है।
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नोएडा टोल बिज का शेयर 15 जून 2007 को 26.50 रुपये पर उपलब्ध था। अब से एक साल पहले यानी 15 जून, 2006 को यह शेयर 36.10 रुपये पर उपलब्ध था। करीब दो साल पहले यह शेयर 25.90 रुपये पर उपलब्ध था।
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इस कंपनी का कामकाज हाल में कुछ सुधऱता हुआ लगता है। मार्च 2006 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में 2.61 करोड़ का शुद्ध लाभ इस कंपनी ने कमाया था। पर मार्च 2007 को खत्म हुए तीन महीनों में ही इस कंपनी ने 4.21 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया।
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नोएडा टोल बिज पर आने-जाने वालों की संख्या बढ़ेगी, ऐसा सामान्य अनुमान लगाया जा सकता है। इस कंपनी के पास पुल के आसपास कुछ जमीन भी है। जिसका कोई भी इस्तेमाल इस कंपनी को और मुनाफे दिलवायेगा। पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस शेयर के भाव लगातार ऊपर गये हैं। दरअसल अभी इस शेयर के भाव उस स्तर पर हैं, जहां दो साल पहले थे।
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इसका बहुत साफ मतलब यह है कि बुनियादी ढांचे से जुड़े शेयरों से कमाने की उम्मीद रखने वालों को बहुत धैर्य रखना पड़ सकता है। बुनियादी ढांचे बहुत लंबे समय में बनता है, और उससे मुनाफा कमाने में भी बहुत लंबा समय लग सकता है।
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बुनियादी क्षेत्र का एक और शेयर है-आईडीएफसी। इस कंपनी ने निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम आधारभूत परियोजनाओं में सहभागिता की है। जाहिर है कि किसी पुल, किसी अस्पताल, किसी सड़क बनने के नतीजे कुछेक महीनों में नहीं आते, इसलिए इस शेयर से बहुत जल्दी कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हालांकि यह अलग बात है कि एक ही साल में इस शेयर के भाव दोगुने हो गये हैं। 15 जून 2007 को आईडीएफसी के शेयर भाव 111.85 रुपये थे।
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एक साल पहले करीब यानी 15 जून 2006 को इसके भाव 54.05 रुपये थे। यानी इस शेयर में जिसने एक साल पहले रकम लगायी है, उसकी रकम दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है।
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एक ही साल में रकम दोगुनी, यह रिटर्न किसी भी मानक से बेहतर ही माना जायेगा। मार्च, 2006 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में इस कंपनी ने 375.64 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया था। मार्च , 2007 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में इस कंपनी ने 462.87 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया था। यानी एक साल में कंपनी के शुद्ध मुनाफे में करीब 23 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।
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यह बढ़ोत्तरी आकर्षक है। लंबे समय तक निवेश का मन बनाने वालों के लिए यह शेयर बेहतर मौका पेश करता है।
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इसी कड़ी में एक शेयर है आईएफसीआई। सरकारी वित्तीय संस्थानों में यह पुराना वित्तीय संस्थान है। पर कुछ समय पहले तक इसका शेयर बहुत ही खराब स्थिति में था। 15 जून 2006 को इसका भाव था-आठ रुपये साठ पैसे। 15 जून 2007 को इसका भाव था-49 रुपये 20 पैसे। यानी एक साल में ही पांच गुने से ज्यादा भाव हो गये इसके। इसमें निवेश करने वाले बेहतर रिटर्न कमा चुके हैं। वैसे कुछ समय पहले तक आईएफसीआई का कामकाज बहुत ही घटिया माना जा रहा था। वित्तीय वर्ष 2006 में इसका घाटा था-177.82 करोड़ रुपये।
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जबकि मार्च 2007 को खत्म होने वाली तिमाही में इसका शुद्ध मुनाफा था-करीब 668 करोड़ रुपये। इसकी वजह यह है कि आईएफसीआई ने इस देश के बुनियादी विकास बहुत पहले सहभागित की है। उस के शेयर अब बाजार में मोटे भावों पर बिक रहे हैं। देश के शीर्ष स्टाक एक्सचेंज नेशनल स्टाक एक्सचेंज में इसने अपने शेयरों को मोटे भावों पर बेचा। देश के बुनियादी ढांचे में पुराना निवेश नया रिटर्न दे रहा है।
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इसके भविष्य को लेकर तरह-तरह के मत हैं। पर इसका हाल के रिकार्ड को देखकर लगता है कि जो निवेशक थोड़े लंबे समय के लिए जोखिम ले सकते हैं, वह इस शेयर के बारे में सोच सकते हैं।
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आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799
निफ्टी में निवेश बोले तो पचास कंपनियों में निवेश
आलोक पुराणिक
बाजार में
कमाई करने का जुगाड़ है, पर यह अनिश्चितताओं के साथ आता है। अनिश्चिचतता शेयर बाजार की बुनियादी खासियतों में से है, इसकी वजह यह है कि किसी को नहीं पता अगले दिन क्या होने वाला है। किसी को नहीं पता कि भूकंप आयेगा और उसकी वज
ह से सीमेंट कंपनियों को कितना फायदा हो जायेगा। पुनर्निर्माण में प्रयुक्त होने वाले सीमेंट की डिमांड बढ़ जायेगी और सीमेंट कंपनियों को फायदा पहुंचेगा।
किसी को नहीं पता कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के भाव कब बढ़ जायेंगे, और कब भारत की पेट्रोलियम कंपनियां घाटा देना शुरु कर देंगी। बाजार की अनिश्चितताओं को खत्म नहीं किया जा सकता है। पर इससे निपटने के उपाय हैं। अगर निवेशक कई कंपनियों में निवेश करे, तो अनिश्चितता की जोखिम एक हद कम हो जाती है।
निफ्टी इंडैक्स पर आधारित मुचुअल फंड इस तरह की योजनाओं में शुमार की जाती हैं, जहां निवेशक की जोखिम कम हो जाती है। इसकी वजह यह है कि निवेश जब इंडैक्स आधारित योजनाओं में निवेश करता है, तो वह एक साथ कई कंपनियों में निवेश कर सकता है। निफ्टी देश के सबसे महत्वपूर्ण स्टाक एक्सचेंज नेशनल स्टाक एक्सचेंज का सूचकांक है, जो पचास कंपनियों पर आधारित है। निफ्टी आधारित मुचुअल फंड में निवेश करने का मतलब है एक साथ इन पचास कंपनियों में निवेश है। गौरतलब है कि ये पचास कंपनियां देश की प्रमुख कंपनियां है।
निफ्टी में शामिल कंपनियां अपने-अपने उद्योगों की महत्वपूर्ण कंपनियां हैं। ये पचास कंपनियां हैं- स्टेट बैंक आफ इंडिया, रिलायंस कम्यूनिकेशन्स, आईसीआईसीआई बैंक, लारसन एंड टूब्रो, रिलायंस इनर्जी, इनफोसिस, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, भारती एयरटेल, हिंदुस्तान लीवर, हिंडाल्को, एचडीएफसी, आईटीसी, टाटा मोटर्स, सुजलोन, ओएनजीसी, टीसीएस, एचडीएफसी बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, सत्यम् कंप्यूटर्स, टाटा स्टील, रिलायंस पेट्रोलियम, सेल, विप्रो, स्टर्लाइट, आईपीसीएल, जी इंटरटेनमेंट, डा रेड्डीज लेब., एबीबी, गैस अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड, पंजाब नेशनल बैंक, सीमेंस, बजाज आटो, टाटा पावर, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, एसीसी, एमटीएनएल, मारुति, गुजरात अंबुजा, ग्रासिम, सन फार्मा, सिपला, एचसीएल टेक, वीएसएनएल, भारत पेट्रोलियम, रैनबैक्सी, हीरो होंडा, डाबर, ग्लैक्सो, नेशनल अल्यूमीनियम। यानी निफ्टी आधारित योजना में निवेश का मतलब है कि इन सारी कंपनियों में एक साथ निवेश।
निम्नलिखित योजनाएं निफ्टी पर आधारित हैं। फ्रैंकलिन टैंपलटन मुचुअल फंड की फ्रैंकलिन निफ्टी को देखें (देखें तालिका) तो साफ होता है कि 22 जून 2007 को इसने 14 दिनों में 2.64 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। एक साल में इसका रिटर्न 42.56 प्रतिशत रहा है। तीन सालों के हिसाब से देखें, तो इसका सालाना रिटर्न 44.18 प्रतिशत रहा है। किसी भी मानक से यह रिटर्न बेहतरीन माना जायेगा। खास तौर पर जब इससे जुड़े जोखिम एक हद कम हो गये हों।
एचडीएफसी निफ्टी आधारित योजना ने एक साल में 39.80 प्रतिशत रिटर्न दिये हैं, और तीन साल का सालाना रिटर्न रहा है 41.16 प्रतिशत।
एलआईसी निफ्टी ने एक साल में 34.33 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, तीन साल में इसका सालाना रिटर्न 31.48 प्रतिशत रहा है। तीन सालों की अवधि में इसका सालाना रिटर्न रहा है-34.33 प्रतिशत।
रिलायंस निफ्टी का एक साल का प्रदर्शन यह है कि इसने 25.86 प्रतिशत का रिटर्न दिया है। टाटा निफ्टी ने एक साल में 39.47 प्रतिशत रिटर्न दिया है, तीन सालों का इसका सालाना रिटर्न 45.98 प्रतिशत रहा है। यूटीआई निफ्टी ने एक साल में 43.08 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, तीन सालों में इसने सालाना रिटर्न 43.48 प्रतिशत का रिटर्न दिया है।
इस तरह से देखें, तो निफ्टी आधारित योजनाओं के रिटर्न में फर्क दिखायी पड़ता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि संबंधित मुचुअल फंड ने निफ्टी शेयरों में ठीक उसी अनुपात में निवेश नहीं किया होगा, जिस अनुपात में उन शेयरों का महत्व निफ्टी सूचकांक में है। यानी मुचुअल फंडों ने निफ्टी को पूरा फालो नहीं किया होगा। इसे वित्तीय शब्दावली में ट्रेकिंग एरर बोलते हैं। यानी निफ्टी को ट्रेक करने में जो एरर जो गलती हुई है, उसके परिणाम स्वरुप यह फर्क आ रहा है।
अगर पिछले तीन सालों के रिटर्न को आधार मानें तो फैंकलिन निफ्टी ने इस श्रेणी में सबसे ज्यादा रिटर्न यानी 44.18 प्रतिशत सालाना का रिटर्न दिया है। पर समझने की बात यह है कि निफ्टी आधारित किसी भी योजना में निवेश का मतलब होता है कि एक साथ पचास कंपनियों में निवेश।
| 22 जून, 2007 को | 14 दिनों का रिटर्न(प्रतिशत) | 1 महीने का रिटर्न (प्रतिशत) | 3 महीने का रिटर्न (प्रतिशत) | 1 साल का रिटर्न(प्रतिशत) | तीन साल का सालाना रिटर्न(प्रतिशत) | नेट एसेट वैल्यू |
| फ्रैंकलिन निफ्टी | 2.64 | -.5 | 9.66 | 42.56 | 44.18 | 33.88 |
| एचडीएफसी निफ्टी | 2.45 | -.6 | 9.94 | 39.80 | 41.16 | 41.41 |
| एलआईसी निफ्टी | 2.43 | -.41 | 8.11 | 34.33 | 31.48 | 26.01 |
| रिलायंस निफ्टी | 2.33 | -.63 | 6.66 | 25.86 | उपलब्ध नहीं | 16.67 |
| टाटा निफ्टी ए | 2.65 | -.59 | 9.01 | 39.47 | 45.98 | 26.24 |
| यूटीआई निफ्टी | 2.67 | -.51 | 9.79 | 43.08 | 43.48 | 27.24 |
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नये बैंक बनाम पुराने बैंक
नये बैंक बनाम पुराने बैंक
आलोक पुराणिक
स्टेट बैंक इस देश का सबसे बड़ा बैंक है, अगर ब्रांच नेटवर्क की बात करें। आयु के मामले में भी यह बैंक खासा पुराना बैंक है। पर शेयर बाजार की निगाह में इस पूरे बैंक की कीमत है-करीब 69,663 करोड़ रुपये(15 जून, 2007)। सिद्धांतत अगर किसी की जेब में इतनी रकम हो, वह इस बैंक को पूरा का पूरा खरीद सकता है।
यह रकम खासी बड़ी रकम है। पर यह छोटी लगने लगती है, यह अगर यह पता चलता है कि स्टेट बैंक के सामने आयु के लिहाज से लगभग शिशु बैंक आईसीआईसीआई की बाजार वैल्यू 15 जून 2007 को थी-करीब 81,654 करोड़ रुपये।
आयु के लिहाज से यह नया बैंक पुराने स्टेट बैंक से बहुत आगे है।
इसकी वजह सिर्फ आक्रामक मार्केटिंग रणनीति नहीं है। इसकी वजह यह भी है कि निवेशकों को लगता है कि आने वाले समय में बैंकिंग क्षेत्र के लिए जो चुनौतियां आने वाली हैं, आईसीआईसीआई उनसे निपटने में पूरे तौर पर लैस है।
शेयर बाजार में इस समय नये और पुराने बैंकों के मूल्यांकन का हिसाब-किताब देखें, तो पता लगता है नये बैंकों के भविष्य को लेकर ज्यादा सकारात्मक अनुमान लगाये जा रहे हैं। निश्चय ही ये अनुमान एक हद तक पुराने परिणामों पर ही आधारित हैं। उदाहरण के लिए अगर आईसीसाईसीआई के आंकड़ें देखें, तो पता लगता है कि अब एक साल पहले यानी 15 जून 2006 को इसका भाव था-482.55 रुपये और 15 जून 2007 को इसका भाव था 908.70 रुपये। यानी एक साल में इस शेयर ने करीब सत्तासी प्रतिशत बढ़ गये। 2005-06 में इसका शुद्ध मुनाफा था-2540.07 करोड़ रुपये, यह 2006-07 में बढ़कर 3110.22 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, यानी करीब बाईस प्रतिशत का इजाफा।
इसके मुकाबले स्टेट बैंक आफ इंडिया ने मुनाफे की बढ़ोत्तरी की बहुत धीमी रफ्तार दिखायी है।
2005-06 में स्टेट बैंक आफ इंडिया का शुद्ध मुनाफा था-4406.67 करोड़ रुपये, यह 2006—07 में यह बढ़कर 4541.31 करोड़ रुपये हो गया। यानी करीब तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी। अगर इस अवधि में मुद्रा-स्फीति की दर औसतन पाँच प्रतिशत मानें, तो यह बढ़ोत्तरी बढ़ोत्तरी नहीं दिखायी देगी। 15 जून 2006 से 15 जून 2007 की अवधि में स्टेट बैंक के शेयर में करीब बहत्तर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। 15 जून 2007 को इसका भाव 1324.10 रुपये पर था।
एक साल में जो बढ़ोत्तरी स्टेट बैंक आफ इंडिया में हुई है, वह निश्चय ही आकर्षक है, पर आईसीआईसीआई से पीछे है।
कुल मिलाकर शेयर बाजार में निजी नये बैंक पुराने सरकारी बैंकों से आगे चल रहे हैं।
यूटीआई बैंक की उम्र पंजाब नेशनल बैंक के मुकाबले बहुत कम है। पंजाब नेशनल बैंक का ब्रांच नेटवर्क भी यूटीआई के मुकाबले बहुत व्यापक है। पर शेयर बाजार पंजाब नेशनल बैंक को ज्यादा मूल्यवान बैंक मानता है। 15 जून 2007 को पंजाब नेशनल बैंक की बाजार कीमत करीब 15,500 करोड़ रुपये थी। यूटीआई बैंक की बाजार कीमत इस तारीख को 18,864 करोड़ रुपये थी।
शेयर बाजार यह संदेश दे रहा है कि अगर किसी बैंक की शाखाएं बहुत व्यापक तौर पर दिखायी पड़ती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उस बैंक के मुनाफे भी जोरदार हैं। यह बात स्टेट बैंक और आईसीआसीआई बैंक की तुलना से साफ होती है। नये बैंकों ने साफ किया है कि बगैर शाखाएं खोले हुए भी बैंकिंग की जा सकती है। एटीएम खोलकर बैंकिंग के काफी काम संपन्न किये जा सकते हैं। शाखाएं खोलने में मोटी लागत आती है। सरकार बैंकों ने एक समय खूब शाखाएं खोली हैं। शाखाएं खोलने से लागत तो बढ़ी, पर मुनाफे उस अनुपात में नहीं बढ़े। यही वजह है कि शेयर बाजार का मूल्यांकन सिर्फ बैंक के साइज पर नहीं हो रहा है। उसके ब्रांच के नेटवर्क के आधार पर नहीं हो रहा है। उसके मुनाफे कमाने की क्षमता के आधार पर हो रहा है।
यही वजह है कि केनरा बैंक जैसे पुराने बैंक की बाजार कीमत करीब 9848 करोड़ रुपये है, जो यूटीआई बैंक की बाजार कीमत -18,864 करोड़ रुपये के मुकाबले बहुत कम है।
स्थिति यह है निजी क्षेत्र का अपेक्षाकृत छोटा बैंक सेंचुरियन बैंक आफ पंजाब का बाजार मूल्य 6065 करोड़ रुपये है, जबकि इंडियन ओवरसीज बैंक जैसे पुराने सरकारी बैंक का बाजार मूल्य 6134 करोड़ रुपये था, 15 जून, 2007 को। एकदम नये निजी बैंक यस बैंक की बाजार कीमत भी करीब 4290 करोड़ रुपये है।
कुल मिलाकर शेयर बाजार यही साफ होता है कि तजुरबे और पुरानी आयु का बहुत ज्यादा महत्व नहीं है, खास तौर पर बैंकिंग शेयरों के लिए। बल्कि एक हद तक पुराना होना एक किस्म का नकारात्मक कारक बन रहा है। पुराने बैंकों के पास यह स्कोप नहीं होता कि वे सारे कामकाज को कंप्यूटरीकृत कर लें। बैंकिंग उद्योग में नये बैंकों को शेयर बाजार में ज्यादा भाव दिये जा रहे हैं।
इसका असर यह होगा कि भविष्य में जब तमाम बैंक बाजार में और पूंजी उगाहने आयेंगे, तो निश्चय ही निजी क्षेत्र के बैंकों सरकारी बैंकों के मुकाबले ज्यादा सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जायेगा। गौरतलब है कि आने वाले दिनों में कई बैंक शेयर आदि के जरिये पूंजी उगाहने की योजना बना रहे हैं। आईसीआईसीआई पूंजी बाजार में पूंजी उगाहने के लिए आने वाला है। पब्लिक सेक्टर के सेंट्रल बैंक की योजना भी पूंजी उगाहने की है।
पूंजी उगाहने के पीछे तरह-तरह के उद्देश्य काम कर रहे हैं। किसी बैंक को प्रतिस्पर्धा में कारोबार को फैलाना है, किसी को नये बाजार के अनुरुप अपनी तकनीक को ढालना है। जाहिर है, जो बैंक पहले दौर में अपनी तकनीक को नये बाजार के काबिल बना चुके हैं, वह इस दौर में मजबूती से नये बाजारों पर कब्जा करने में कामयाब होंगे। जैसे आईसीआईसीआई का इरादा है के ग्रामीण बाजारों पर कब्जा किया जाये। पब्लिक सेक्टर के बैंकों के लिए अभी तो चुनौती यह है कि नयी तकनीक के हिसाब से खुद को कैसे ढालें।
यानी कुल मिलाकर पब्लिक सेक्टर के पुराने बैंक निजी क्षेत्र के नये बैंकों से पीछे चल रहे हैं। शेयर बाजार इस बात को बार-बार रेखांकित कर रहा है।
आलोक पुराणिक मोबाइल-0-9810018799
पचास कंपनियों में निवेश यानी जूनियरबीस
आलोक पुराणिक
फोन था एक मित्र का, बता रहे थे कि सत्तर हजार रुपये फ्यूचर और आप्शन्स में लगा दिये हैं। मैंने पूछा-कभी शेयर में निवेश किया है। उन्होने बताया कि पहली बार इस बाजार में उतरे हैं और सीधे फ्यूचर आप्शन्स में।
निवेशकों को एक बात बिलकुल साफ तौर पर ध्यान में रखनी चाहिए कि जिन मामलों की समझ न हो, उनमें भूलकर भी हाथ ना डालें। शेयर बाजार के नये निवेशकों को फ्यूचर आप्शन्स तो दूर सीधे शेयरों में भी निवेश नहीं करना चाहिए। उन्हे मुचुअल फंडों से शुरुआत करनी चाहिए। नये निवेशकों के लिए बेहतर रास्ता मुचुअल फंडों का है।
बल्कि अब तो ऐसे मुचुअल फंड उपलब्ध हैं, जिनका शेयर बाजार में कारोबार होता है, यानी जिन्हे शेयर की तरह खरीदा-बेचा जा सकता है। एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी ईटीएफ इसी तरह के फंडों की श्रेणी में आते हैं।
उदाहरण के लिए एक ईटीएफ है-जूनियरबीस। यानी इसमें निवेश का मतलब है कि एक साथ देश की पचास कंपनियों में निवेश। बेंचमार्क मुचुअल फंड द्वारा शुरु की गयी इस योजना के तहत निवेश उन पचास कंपनियों में ही किया जाता है जो नेशनल स्टाक एक्सचेंज की जूनियर निफ्टी इंडैक्स का हिस्सा हैं। जूनियर निफ्टी इंडैक्स मूलत उन पचास कंपनियों को समाहित करती है, जो अभी देश की बड़ी कंपनियों में तो शामिल नहीं हैं, पर जो तेजी से विकसित हो रही हैं। इनकी विकास की रफ्तार खासी तेज है। और इसमें किया गया निवेश दीर्घकाल यानी पांच से सात साल बाद बहुत बढ़िया प्रतिफल दे सकता है।
निवेशक नेशनल स्टाक एक्सचेंज से जूनियरबीस का शेयर खरीद सकता है। इस निवेश के लिए निवेशक के पास डिमैट एकाउंट होना जरुरी है, क्योंकि जूनियरबीस की खरीद-फरोख्त बतौर शेयर ही होती है।
जूनियरबीस की हाल की परफारमेंस इस प्रकार है-आठ जून, 2007 को नेट एसेट वैल्यू- 81.04 रुपयेएक महीने में प्रतिफल- 5.97 प्रतिशततीन महीनों में प्रतिफल-21.01 प्रतिशतएक साल में प्रतिफल- 70.66 प्रतिशत तीन सालों में प्रतिफल- 39.45 प्रतिशत सालाना एक साल पहले जिन निवेशकों ने निवेश किया है, वे करीब 70.66 प्रतिशत का प्रतिफल पा चुके हैं।
इस प्रतिफल को बेहतरीन कहा जा सकता है। तीन सालों का रिकार्ड देखें तो साफ होता है कि इस अवधि में प्रतिवर्ष इसने 39.45 प्रतिशत सालाना का प्रतिफल दिया है। जूनियरबीस में जोखिम कम इसलिए है कि इसमें लगा निवेश पचास कंपनियों जाता है। ये पचास कंपनियां हैं- आंध्रा बैंक, अपोलो टायर्स, अशोक लैलेंड, एशियन पेंट्स लिमिटेड, अरबिंदो फार्मा, एवेंटिस फार्मा, बैंक आफ बड़ौदा, बैंक आफ इंडियाभारत इलेक्ट्रानिक्स,भारत फोर्ज,बायोकोन, बोनगाईगांव रिफाइनरी, कैडिला हेल्थकेयर, कैनरा बैंक, चेन्नई पेट्रोलियम, कंटेनर कारपोरेशन, कारपोरेशन बैंक, कमिन्स इंडिया, आई फ्लैक्स सोल्यूशन्स, आईबीपी कंपनी,इंडस्ट्रियल बैंक आफ इंडिया, आईएफडीसी,आईएफसीआई, इंडियन होटल्स, इंगरसोल रैंड इंडिया,आईएनजी वैश्य बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, जयप्रकाश एसोसिएट्स,कोटक महिंद्रा बैंक, एलआईसी हाऊसिंग फाइनेंस , लुपिन लिमिटेड, मोजर बेयर, एमफेसिस लि.,निकोलस पीरामल, निरमा, पाटनी कंप्यूटर सिस्टम्स, फाईजर, पोलारिस साफ्टवेयर, पंजाब ट्रेक्टर्स, रेमंड, रिलायंस केपिटल,रिलायंस पेट्रोलियम,स्टरलाईट, सिंडीकेट बैंक, टाटा टेलीसर्विसेज, टीवीएस मोटर, यूनियन बैंक।
जूनियरबीस में शामिल सारी कंपनियां अपने उद्योगों की शीर्ष कंपनियां नहीं हैं। पर वे उभरती हुई कंपनियां हैं, तेजी से बाजार में अपनी जगह बनाती हुई कंपनियां हैं। निफ्टी जूनियर सूचकांक ऐसी ही कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है। जूनियरबीस की निवेश रणनीति इसी निफ्टी जूनियर पर केंद्रित है।
गौरतलब है कि मंझोली और छोटी कंपनियों में विकास की रफ्तार कमोबेश ज्यादा हो सकती है, उन कंपनियों के मुकाबले जो बहुत बड़ी हैं। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था में ये कंपनियां भी तेजी से बढ़ेंगी और बढ़ेगा निवेशकों का प्रतिफल। शेयर बाजार में निवेश की शुरुआत करने वाले कम जोखिम वाले इस निवेश से शुरुआत कर सकते हैं। आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799
सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य़ के लिए हानिकारक है
सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है
आलोक पुराणिक
इधर अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार का जो हाल हो गया है, उसमें कुछ काम बहुत जरुरी हो गये हैं। इन कामों में से पहला काम यह है कि जिन अखबारों और चैनलों में मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक सेनसेक्स और नेशनल स्टाक एक्सचेंज के सूचकांक निफ्टी की रिपोर्टिंग की जाती है, उनमें साफ तौर पर लिखा जाये कि सेनसेक्स और निफ्टी देखने में सावधानी बरतें। आम तौर पर सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कुछेक महीनों पहले जो अर्थव्यवस्था बूम पर दिखायी पड़ती थी, अब एकदम से फिसलती दिखायी पड़ रही है। घर के लिए जो कर्ज सात प्रतिशत में मिल जाया करता था, अब बारह प्रतिशत से ऊपर की दर पर ही मिल रहा है। घर कर्ज लेने वालों की संख्या में कमी आयी है। बैंकों से अब वैसे फोन काल आना बंद हो गया है, जिनमें कहा जाता था कि इस चीज के लिए कर्ज ले लीजिये, उस चीज के लिए कर्ज ले लीजिये। रिजर्व बैंक ने अपने हाल के कदमों से ये सुनिश्चित किया है कि बैंकों के पास कर्ज देने के लिए संसाधन और कम हो जायें। संसाधन कम होंगे, तो जाहिर कि बैंक दिये जाने वाले कर्ज की और महंगी दर वसूलेंगे। कार कंपनियों को अपनी सेल की चिंता हो रही है। अधिकांश कारें कर्ज पर खरीदी जाती हैं। कर्ज महंगा होगा, तो लोग कारें कम लेंगे। आटोमोबाइल उद्योग की मांग कम होगी, तो सेल कम होगी, तो मुनाफे कम होंगे, तो विस्तार योजनाओं पर असर पड़ेगा, तो मंदी का माहौल बनेगा।
थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर जो लंबे अरसे तक चार प्रतिशत के आसपास चलती थी, अब साढ़े छह से सात फीसदी के आसपास टिकी हुई है। इसके कम होने का आसार नहीं हैं। रिजर्व बैंक तमाम कदमों से इसे कम करना चाहता है। रिजर्व बैंक के मुताबिक साढ़े पांच प्रतिशत से ज्यादा महंगाई दर ठीक नहीं है।
पर रिजर्व बैंक के चाहने भर से महंगाई कम नहीं हो जाती। आटा, दाल, चावल के भाव सिर्फ रिजर्व बैंक के चाहने से कम नहीं हो जाते। अर्थव्यवस्था में खासा तनाव का माहौल है। जो सेक्टर कुछ समय पहले उछलते दिखायी पड़ते थे। अब उन पर मंदी की छाया पड़ती दिखायी पड़ रही है। आटोमोबाइल, हाऊसिंग और साफ्टवेयर क्षेत्र कुछ समय पहले अर्थव्यवस्था के बहुत उछलते हुए क्षेत्र थे। अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था से मंदी की खबरों ने साफ्टवेयर क्षेत्र को परेशान किया है। गौरतलब है कि साफ्टवेयर कंपनियों के अमेरिकी बाजार खासा महत्वपूर्ण बाजार है। वहां की मंदी के बादल यहां भी निराशा बरसाते हैं।
कुल मिलाकर ये सारे आसार ठीक नहीं हैं। सो शेयर बाजार भी निराशा में झूल रहा है। बजट ने शेयर बाजार को वह सब नहीं दिया, जिसकी उम्मीद शेयर बाजार को थी। अब हाल के हालात ने शेयर बाजार को और निराश किया है। 5 अप्रैल, 2007 को सेनसेक्स 12856 बिंदु पर बंद हुआ। कुछ दिनों पहले सेनसेक्स के पंद्रह हजार का अंक छूने की बात की जा रही थी।
तमाम बिजनेस चैनलों पर स्टाक बाजार के एक्सपर्टों को देखना इन दिनों खासा रोचक अनुभव है। जब बाजार ऊपर उठता हुआ दिखता है, तो वे तमाम सकारात्मक तत्वों को बताने में जुट जाते हैं-जैसे देश में नौजवानों की तादाद बहुत ज्यादा है। कुल जनसंख्या में बावन प्रतिशत से ज्यादा लोग पच्चीस सालों से नीचे के हैं। इसलिए मोबाइल से लेकर बाइक तक की सेल अच्छी होगी। फिर लोगों की आमदनी बढ़ रही है, इसलिए खरीद क्षमता बढ़ रही है। और जिस दिन बाजार गिरता है, उस दिन इस तरह की बातें सामने आती हैं कि ब्याज दरें बढ़ गयीं है। महंगाई बढ़ रही है, इसके चलते खऱीद क्षमता में कमी आ रही है। एक ही एक्सपर्ट दो-चार दिनों के हेर-फेर में उलटी बातें कह सकता है। गलती उसकी भी नहीं है, अर्थव्यवस्था में एक साथ उलटी बातें भी हो रही हैं। मोबाइल फोन सस्ते हो रहे हैं, पर आटे के भाव एक साल में चालीस फीसदी बढ़ गये हैं।
खैर मसला यह है कि ऐसे मे वे निवेशक क्या करें, जो सेनसेक्स के उतरने-और चढ़ने से परेशान होते हैं। खास तौर ऐसे छोटे निवेशकों को संख्या बहुत ज्यादा है, जिन्होने हाल में आयी तेजी के हल्ले में शेयरों में निवेश किया है। मुचुअल फंडों में निवेश किया है। उन्हे अपना निवेश कम होता दिखता है। वे परेशान होते हैं। ऐसे निवेशकों को सबसे पहले यह काम करना चाहिए कि उन्हे रोज-रोज सेनसेक्स का आंकड़ा देखना छोड़ना चाहिए और तय करना चाहिए कि पांच सालों से पहले वे सेनसेक्स के आंकड़े को नहीं देखेंगे। दिक्कत यह हो गयी है कि इधर ऐसे निवेशक बाजार में बहुत आ गये हैं, जो आज निवेश करके अगले हफ्ते रकम दोगुनी करना चाहते हैं।
इधर एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि कई निवेशक दीर्घकालीन निवेश का अर्थ एक साल के लिए किये जाने वाले निवेश से लगाते हैं। एक साल का निवेश दीर्घकालीन निवेश अगर माना जायेगा, तो इसके नकारात्मक परिणाम आयेंगे ही। कायदे से एक साल तक के निवेश को अल्पकालिक निवेश ही माना जाना चाहिए। एक साल से पांच साल तक के किये जाने वाला निवेश मध्यमावधि का निवेश है। दीर्घकालीन निवेश तो वह है, जो पांच सालों से ज्यादा के लिए किया जाये। अल्पावधि में स्टाक बाजार से कमाने के लिए भाग्य का साथ चाहिए, जैसे जुए में कमाने के लिए भाग्य का साथ होना जरुरी है। पर दीर्घकालीन अवधि के लिए किया जाना वाला निवेश आम तौर सकारात्मक परिणाम लाता है।
सेनसेक्स को ही देखें, 1979 में जिसने सेनसेक्स के शेयरों में सौ रुपये लगाये, वह अब करीब 12856 रुपये का मालिक है। मोटे तौर पर सेनसेक्स ने हर साल अठारह प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि विकास दर दिखायी है। पर यह दर तब दिखती है, जब किसी ने 1979 से अब तक इन शेयरों को रखा हो। एकाध साल की अवधि के हिसाब से देखें, तो सेनसेक्स पिछले साल भी वर्तमान स्तर के आसपास टहल रहा था। यानी एक साल पहले सेनसेक्स में रकम लगाने वालों को कुछ खास हासिल नहीं है। यह अलग बात है इस बीच सेनसेक्स नौ हजार बिंदु के आसपास भी जा चुका है।
पर सेनसेक्स कब नीचे जायेगा और कब ऊपर जायेगा, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं हो सकता, क्योंकि बड़ा से बड़ा ज्योतिषी भी यह नहीं बता सकता कि अमेरिका कब ईरान पर हमला कर देगा और कब तेल के भाव बढ़ जायेंगे या कब भारतीय
बाजारों से विदेशी संस्थान अपने पैसे वापस खींचना शुरु कर देंगे। सेनसेक्स रोजमर्रा के हिसाब-किताब में इन सारे कारकों से प्रभावित होती है, पर दीर्घकाल में ऐसी सारी उठापटक होकर शांत हो जाती है। पर रोज सेनसेक्स देखने वाले अशांत हो जाते हैं।
इसलिए वित्त मंत्रालय से अनुरोध है कि वह फौरन यह निर्देश जारी करे कि सेनसेक्स देखते समय किन सावधानियों का पालन जरुरी है। और सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, यह वैधानिक चेतावनी जगह-जगह दर्ज करा देनी चाहिए।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामपस्थ गाजियाबाद-201011 मोबाइल-9810018799
पूरी सेनसेक्स को ही खरीदिये ना
पूरी सेनसेक्स को ही खऱीद सकते हैं आप
आलोक पुराणिक
भारतीय शेयर बाजारों की सबसे ज्यादा पापुलर इंडेक्स है सेनसेक्स। सेनसेक्स यानी सेंसिटिव इंडैक्स। मुंबई शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव दिखाने वाली यह इंडेक्स तीस शेयरों पर आधारित है। यह शेयर देश की बेहतरीन कंपनियों के हैं। सेनसेक्स में शामिल होना किसी भी शेयर के लिए सम्मान की बात है। यह सम्मान अपने क्षेत्र की अगुआ कंपनियों को ही मिल पाता है।
उदाहरण के लिए सेनसेक्स में इनफोसिस, रिलायंस इंडस्ट्री, आईसीआईसीआई जैसी कंपनियां शामिल हैं। सेनसेक्स का ग्राफ हालके सालों में बहुत तेजी से चढ़ा है। 15 जनवरी, 2007 को सेनसेक्स 14,129.60 बिंदुओं पर बंद हुआ, यही सेनसेक्स जून 2006 में नौ हजार के स्तर तक भी चुका है। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जिसने सेनसेक्स में जून में नौ हजार के स्तर पर निवेश किया होता, उसके निवेश में अब तक करीब 57 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हो चुकी होती। करीब सात महीनों में 57 प्रतिशत का रिटर्न कम नहीं होता। पर सवाल यह है कि क्या सेनसेक्स में निवेश किया जा सकता है। इसका जवाब यह है कि सेनसेक्स में भी निवेश किया जा सकता है। पूरी सेनसेक्स बतौर शेयर बाजार में उपलब्ध है और इसकी खरीद-फरोख्त बतौर शेयर होती है। इस शेयर को संक्षेप में कहते हैं-स्पाइस यानी सेनसेक्स आधारित प्रूडेंशियल आईसीआईसीआई फंड। यह शेयर मुंबई शेयर बाजार में सूचीबद्ध है। मुंबई शेयर बाजार में इसका स्क्रिप कोड है-555555, इस फंड में निवेश यानी एक साथ सेनसेक्स की सारी कंपनियों में एक साथ निवेश। सेनसेक्स में निवेश का फायदा यह है कि निवेशक इस चिंता से मुक्त हो सकता है कि उसने अच्छी कंपनियों में निवेश किया है या घटिया कंपनियों में। सेनसेक्स कंपनियों में निवेश का अर्थ है-एक न्यूनतम गुणवत्ता वाली कंपनी में निवेश।
मोटे तौर पर सेनसेक्स के कैलकुलेशन यूं समझे जा सकते हैं। सेनसेक्स कब कितना बढ़ेगा या घटेगा, इसका अनुमान लगाना खासा जोखिम का काम है। फिर भी अगर यह अनुमान लगाया जाये कि सेनसेक्स अगर हर साल बीस प्रतिशत

की दर से बढ़ता रहा, तो छह साल बाद यह 41,800 बिंदुओं पर पहुंचेगा। गौरतलब है कि सेनसेक्स की बढ़ने की रफ्तार 2006 में चालीस फीसदी से ज्यादा रही है। बीस प्रतिशत सालाना का अनुमान बहुत ज्यादा नहीं है, यह देखते हुए कि सकल घरेलू उत्पाद में आगामी वर्षों में दस प्रतिशत सालाना की बढ़ोत्तरी अनुमानित है।
अब के करीब चौदह हजार बिंदुओं से अगर छह साल बाद के संभावित 41,800 बिंदुओं की तुलना करें, तो सेनसेक्स करीब तीन गुने स्तर पर पहुंचा दिखायी देता है। यानी छह साल में सेनसेक्स में निवेश करीब दो गुने का प्रतिफल दे सकता है। सेनसेक्स में निवेश दूसरे शेयरों में निवेश के मुकाबले दो वजहों से सुरक्षित है। एक तो इसमें निवेश करते ही कई शेयरों में निवेश हो जाता है। दूसरे सेनसेक्स शेयरों में निवेश का मतलब स्तरीय निवेश होता है। तो पूरी सेनसेक्स को खरीद पाना अब संभव है।
स्पाइस में निवेश करके सेनसेक्स में निवेश के विकल्प पर निवेशक विचार कर सकते हैं।
स्पाइस
में निवेश करने के लिए डीमैट खाते का होना जरुरी है क्योंकि स्पाइस एक्सचेंज ट्रेडेड फंड है यानी एक ऐसा फंड ज
जिसे नियोजित तो मुचुअल फंड ने किया है, पर इसकी खरीद-फरोख्त बतौर शेयर होती है।
सेनसेक्स आधारित शेयर में निवेश का एक फायदा यह है कि सेनसेक्स का विश्लेषण इतने तरीकों से इतने विद्वानों द्वारा क
किया जाता है कि निवेशक तो तरह-तरह के विश्लेषण उपलब्ध हो सकते हैं। सेनसेक्स आधारित शेयर में निवेश करने का एक फायदा यह है कि सेनसेक्स सूचकांक विदेशी निवेशकों के आकर्षण का भी केंद्र होता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों के आकर्षण का केंद्र सेनसेक्स सूचकांक होता है। सो कुल मिलाकर शेयर बाजार में अगर बढ़ोत्तरी होती है, तो सेनसेक्स में बढ़ोत्तरी भी संभावित है। सेनसेक्स में निवेश का जोखिम यह है कि किसी भी शेयर की तरह सेनसेक्स गिरता भी है। सेनसेक्स एक दिन में हजार बिंदु भी गिर सकता है। इसके उलट एक दिन में यह एक हजार बिंदु बढ़ भी स
कता है। पर यह जोखिम तो हर शेयर में है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि दीर्घकाल के लिए निवेश करने वाले निवेशक इसमें अच्छे प्रतिफल की उम्मीद कर सकते हैं।
आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामप्रस्थ गाजियाबाद-201011
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