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बनता बुनियादी ढांचा, बनते मुनाफे

  •        बनना बुनियादी ढांचा, बनते मुनाफे       

  • आलोक पुराणिक

  •   देश बन रहा है। मतलब अगर पुलों, सड़कों, राजमार्गों का बनना देश का बनना है, तो देश तेजी से बन रहा है।

  •  देश बनाने की इस किस्म की गतिविधियां साठ के दशक में देखी गयी थीं। आज जितने  बड़े बांध, बड़ी परियोजनाएं दिखायी पड़ती हैं, उनकी नींव कहीं न कहीं साठ के दशक में रखी गयी थी।       आर्थिक उदारीकरण के बाद बुनियादी ढांचे का विकास एक नये महत्व का मसला हो गया है। विदेशी निवेश लाने से पहले निवेशक शर्त लगा रहे हैं कि  भारत का बुनियादी ढांचा बेहतर होना चाहिए। मतलब सड़कें बेहतर होनी चाहिए।  बिजली की स्थिति बेहतर होनी चाहिए। इस स्थिति में उन कंपनियों की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद है जो किसी न किसी तरह से बुनियादी ढांचे के किसी कारोबार से जुड़ी हुई हैं।       पिछले कुछ सालों में बुनियादी ढांचे के विकास के माडल में बहुत बदलाव हुआ है।       एक दौर था, जब सड़क, बाँध, पुल बनाने की जिम्मेदारी सरकार की मानी जाती थी।   

  •     अब ऐसा नहीं है। सरकार के पास संसाधनों का टोटा है।

  • सो नये –नये माडल विकसित हो रहे हैं, निजी क्षेत्र की मदद बुनियादी ढांचे के विकास में ली जा रही है। और तो और प्रयोक्ताओं से ही पैसे वसूले जा रहे हैं। दिल्ली के करीब नोएडा को आश्रम से जोड़ने वाला नोएडा टोल पुल इस बात का नमूना है। इस पर जाने वाले यात्रियों को रकम ढीली करनी पड़ती है। इस कंपनी ने पब्लिक से पैसा लिया है। अब मुनाफे कमा कर अपने निवेशकों को लाभ पहुंचाना इस कंपनी का नैतिक कर्तव्य है।       नोएडा टोल ब्रिज कंपनी बुनियादी ढांचे के नये बनते माडल का एक नमूना है। जो पुराने माडल से एकदम अलग है। यह पुल किसी आम सरकारी पुल की तरह नहीं है। इसे जो कंपनी चलाती है, उसकी जिम्मेदारी अपने शेयरधारकों के प्रति बनती है। bridge.jpg     

  •  नोएडा टोल बिज का शेयर 15 जून 2007 को 26.50 रुपये पर उपलब्ध था।  अब से एक साल पहले यानी 15 जून, 2006 को यह शेयर 36.10 रुपये पर उपलब्ध था। करीब दो साल पहले यह शेयर 25.90 रुपये पर उपलब्ध था।

  • इस कंपनी का कामकाज हाल में कुछ सुधऱता हुआ लगता है। मार्च 2006 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में 2.61 करोड़ का शुद्ध लाभ इस कंपनी ने कमाया था। पर मार्च 2007 को खत्म हुए तीन महीनों में ही इस कंपनी ने 4.21 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया।      

  •  नोएडा टोल बिज पर आने-जाने वालों की संख्या बढ़ेगी, ऐसा सामान्य अनुमान लगाया जा सकता है। इस कंपनी के पास पुल के आसपास कुछ जमीन भी है। जिसका कोई भी इस्तेमाल इस कंपनी को और मुनाफे दिलवायेगा। पर इसका मतलब यह नहीं है कि इस शेयर के भाव लगातार ऊपर गये हैं। दरअसल अभी इस शेयर के भाव उस स्तर पर हैं, जहां दो साल पहले थे।     

  •   इसका बहुत साफ मतलब यह है कि बुनियादी ढांचे से जुड़े शेयरों से कमाने की उम्मीद रखने वालों को बहुत धैर्य रखना पड़ सकता है। बुनियादी ढांचे बहुत लंबे समय में बनता है, और उससे मुनाफा कमाने में भी बहुत लंबा समय लग सकता है।      

  •  बुनियादी क्षेत्र का एक और शेयर है-आईडीएफसी। इस कंपनी ने निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम आधारभूत परियोजनाओं में सहभागिता की है। जाहिर है कि किसी  पुल, किसी अस्पताल, किसी सड़क बनने के नतीजे कुछेक महीनों में नहीं आते, इसलिए इस शेयर से बहुत जल्दी कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हालांकि यह अलग बात है कि एक ही साल में इस शेयर के भाव दोगुने हो गये हैं।       15 जून 2007 को आईडीएफसी के शेयर भाव 111.85 रुपये थे।

  • एक साल पहले करीब यानी 15 जून 2006 को इसके भाव 54.05 रुपये थे।       यानी इस शेयर में जिसने एक साल पहले रकम लगायी है, उसकी रकम दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है।    

  •    एक ही साल में रकम दोगुनी, यह रिटर्न किसी भी मानक से बेहतर ही माना जायेगा।      मार्च, 2006 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में इस कंपनी ने 375.64 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया था।       मार्च , 2007 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में इस कंपनी ने 462.87 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया था।       यानी एक साल में कंपनी के शुद्ध मुनाफे में करीब 23 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।      

  •  यह बढ़ोत्तरी आकर्षक है। लंबे समय तक निवेश का मन बनाने वालों के लिए यह शेयर बेहतर मौका पेश करता है।      

  •  इसी कड़ी में एक शेयर है आईएफसीआई।       सरकारी वित्तीय संस्थानों में यह पुराना वित्तीय संस्थान है। पर कुछ समय पहले तक इसका शेयर बहुत ही खराब स्थिति में था।       15 जून 2006 को इसका  भाव था-आठ रुपये साठ पैसे।      15 जून 2007 को इसका भाव था-49 रुपये 20 पैसे।       यानी एक साल में ही पांच गुने से ज्यादा भाव हो गये इसके।       इसमें निवेश करने वाले बेहतर रिटर्न कमा चुके हैं।       वैसे कुछ समय पहले तक आईएफसीआई का कामकाज बहुत ही घटिया माना जा रहा था।       वित्तीय वर्ष 2006 में इसका घाटा था-177.82 करोड़ रुपये।      

  • जबकि मार्च 2007 को खत्म होने वाली तिमाही में इसका शुद्ध मुनाफा था-करीब 668 करोड़ रुपये।       इसकी वजह यह है कि आईएफसीआई ने इस देश के बुनियादी विकास बहुत पहले सहभागित की है। उस के शेयर अब बाजार में मोटे भावों पर बिक रहे हैं। देश के शीर्ष स्टाक एक्सचेंज नेशनल स्टाक एक्सचेंज में इसने अपने शेयरों को मोटे भावों पर बेचा।  देश के बुनियादी ढांचे में पुराना निवेश नया रिटर्न दे रहा है।     

  •   इसके भविष्य को लेकर तरह-तरह के मत हैं। पर इसका हाल के रिकार्ड को देखकर लगता है कि जो निवेशक थोड़े लंबे समय के लिए जोखिम ले सकते हैं, वह इस शेयर के बारे में सोच सकते हैं।    

  •    आलोक पुराणिक मोबाइल-09810018799       

जुलाई 31, 2007 - Posted by | Uncategorized

4s टिप्पणियाँ »

  1. आपका विश्लेषण एकदम समझ में आ जाने वाला है.
    इस ब्लाग के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

    Comment by मैथिली | जुलाई 31, 2007

  2. बहुत सार्थक पहल. इसकी महती आवश्यकता थी. स्वागत है आलोक भाई, आपके इस ब्लॉग का.

    Comment by समीर लाल | जुलाई 31, 2007

  3. [...] सैंया भये मन्त्री तब नियम काहे का आलोक पुराणिक बता रहे हैं कमाई कि बातें उस हिन्दी में जिसे आप समझते हैं [...]

    Pingback by विशिष्ट विषयों पर ब्लाग्स का आना शुभ संकेत है. » ब्लॉगबाबा | अगस्त 1, 2007

  4. 1. चलो; स्मार्ट निवेश की कक्षायें प्रारम्भ तो हुईं. यह पहला व्याख्यान अच्छा था. दस में सात की रेटिंग दूंगा.
    2. ओपनिंग शॉट अच्छा है. कॉपीबुक स्टाइल में है. आगे अनकंवेंशनल शॉट्स की भी उम्मीद की जाये?

    Comment by ज्ञान दत्त पाण्डेय | अगस्त 1, 2007


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