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सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य़ के लिए हानिकारक है

 सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

            आलोक पुराणिक

      इधर अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार का जो हाल हो गया है, उसमें कुछ काम बहुत जरुरी हो गये हैं। इन कामों में से पहला काम यह है कि जिन अखबारों और चैनलों में मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक सेनसेक्स और नेशनल स्टाक एक्सचेंज के सूचकांक निफ्टी की रिपोर्टिंग की जाती है, उनमें साफ तौर पर लिखा जाये कि सेनसेक्स और निफ्टी देखने में सावधानी बरतें। आम तौर पर सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

      कुछेक महीनों पहले जो अर्थव्यवस्था बूम पर दिखायी पड़ती थी, अब एकदम से फिसलती दिखायी पड़ रही है। घर के लिए जो कर्ज सात प्रतिशत में मिल जाया करता था, अब बारह प्रतिशत से ऊपर की दर पर ही मिल रहा है। घर कर्ज लेने वालों की संख्या में कमी आयी है। बैंकों से अब वैसे फोन काल आना बंद हो गया है, जिनमें कहा जाता था कि इस चीज के लिए कर्ज ले लीजिये, उस चीज के लिए कर्ज ले लीजिये। रिजर्व बैंक ने अपने हाल के कदमों से ये सुनिश्चित किया है कि बैंकों के पास कर्ज देने के लिए संसाधन और कम हो जायें। संसाधन कम होंगे, तो जाहिर कि बैंक दिये जाने वाले कर्ज की और महंगी दर वसूलेंगे। कार कंपनियों को अपनी सेल की चिंता हो रही है। अधिकांश कारें कर्ज पर खरीदी जाती हैं। कर्ज महंगा होगा, तो लोग कारें कम लेंगे। आटोमोबाइल उद्योग की मांग कम होगी, तो सेल कम होगी, तो मुनाफे कम होंगे, तो विस्तार योजनाओं पर असर पड़ेगा, तो मंदी का माहौल बनेगा।

      थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर जो लंबे अरसे तक चार प्रतिशत के आसपास चलती थी, अब साढ़े छह से सात फीसदी के आसपास टिकी हुई है। इसके कम होने का आसार नहीं हैं। रिजर्व बैंक तमाम कदमों से इसे कम करना चाहता है। रिजर्व बैंक के मुताबिक साढ़े पांच प्रतिशत से ज्यादा महंगाई दर ठीक नहीं है।

      पर रिजर्व बैंक के चाहने भर से महंगाई कम नहीं हो जाती। आटा, दाल, चावल के भाव सिर्फ रिजर्व बैंक के चाहने से कम नहीं हो जाते। अर्थव्यवस्था में खासा तनाव का माहौल है। जो सेक्टर कुछ समय पहले उछलते दिखायी पड़ते थे। अब उन पर मंदी की छाया पड़ती दिखायी पड़ रही है। आटोमोबाइल, हाऊसिंग और साफ्टवेयर क्षेत्र कुछ समय पहले अर्थव्यवस्था के बहुत उछलते हुए क्षेत्र थे। अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था से मंदी की खबरों ने साफ्टवेयर क्षेत्र को परेशान किया है। गौरतलब है कि साफ्टवेयर कंपनियों के अमेरिकी बाजार खासा महत्वपूर्ण बाजार है। वहां की मंदी के बादल यहां भी निराशा बरसाते हैं।

      कुल मिलाकर ये सारे आसार ठीक नहीं हैं। सो शेयर बाजार भी निराशा में झूल रहा है। बजट ने शेयर बाजार को वह सब नहीं दिया, जिसकी उम्मीद शेयर बाजार को थी। अब हाल के हालात ने शेयर बाजार को और निराश किया है। 5 अप्रैल, 2007 को सेनसेक्स 12856 बिंदु पर बंद हुआ। कुछ दिनों पहले सेनसेक्स के पंद्रह हजार का अंक छूने की बात की जा रही थी।

      तमाम बिजनेस चैनलों पर स्टाक बाजार के एक्सपर्टों को देखना इन दिनों खासा रोचक अनुभव है। जब बाजार ऊपर उठता हुआ दिखता है, तो वे तमाम सकारात्मक तत्वों को बताने में जुट जाते हैं-जैसे देश में नौजवानों की तादाद बहुत ज्यादा है। कुल जनसंख्या में बावन प्रतिशत से ज्यादा लोग पच्चीस सालों से नीचे के हैं। इसलिए मोबाइल से लेकर बाइक तक की सेल अच्छी होगी। फिर लोगों की आमदनी बढ़ रही है, इसलिए खरीद क्षमता बढ़ रही है। और जिस दिन बाजार गिरता है, उस दिन इस तरह की बातें सामने आती हैं कि ब्याज दरें बढ़ गयीं है। महंगाई बढ़ रही है, इसके चलते खऱीद क्षमता में कमी आ रही है। एक ही एक्सपर्ट दो-चार दिनों के हेर-फेर में उलटी बातें कह सकता है। गलती उसकी भी नहीं है, अर्थव्यवस्था में एक साथ उलटी बातें भी हो रही हैं। मोबाइल फोन सस्ते हो रहे हैं, पर आटे के भाव एक साल में चालीस फीसदी बढ़ गये हैं।

      खैर मसला यह है कि ऐसे मे वे निवेशक क्या करें, जो सेनसेक्स के उतरने-और चढ़ने से परेशान होते हैं। खास तौर ऐसे छोटे निवेशकों को संख्या बहुत ज्यादा है, जिन्होने हाल में आयी तेजी के हल्ले में शेयरों में निवेश किया है। मुचुअल फंडों में निवेश किया है। उन्हे अपना निवेश कम होता दिखता है। वे परेशान होते हैं। ऐसे निवेशकों को सबसे पहले यह काम करना चाहिए कि उन्हे रोज-रोज सेनसेक्स का आंकड़ा देखना छोड़ना चाहिए और तय करना चाहिए कि पांच सालों से पहले वे सेनसेक्स के आंकड़े को नहीं देखेंगे। दिक्कत यह हो गयी है कि इधर ऐसे निवेशक बाजार में बहुत आ गये हैं, जो आज निवेश करके अगले हफ्ते रकम दोगुनी करना चाहते हैं।

      इधर एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि कई निवेशक दीर्घकालीन निवेश का अर्थ एक साल के लिए किये जाने वाले निवेश से लगाते हैं। एक साल का निवेश दीर्घकालीन निवेश अगर माना जायेगा, तो इसके नकारात्मक परिणाम आयेंगे ही। कायदे से एक साल तक के निवेश को अल्पकालिक निवेश ही माना जाना चाहिए। एक साल से पांच साल तक के किये जाने वाला निवेश मध्यमावधि का निवेश है। दीर्घकालीन निवेश तो वह है, जो पांच सालों से ज्यादा के लिए किया जाये। अल्पावधि में स्टाक बाजार से कमाने के लिए भाग्य का साथ चाहिए, जैसे जुए में कमाने के लिए भाग्य का साथ होना जरुरी है। पर दीर्घकालीन अवधि के लिए किया जाना वाला निवेश आम तौर सकारात्मक परिणाम लाता है।

      सेनसेक्स को ही देखें, 1979 में जिसने सेनसेक्स के शेयरों में सौ रुपये लगाये, वह अब करीब 12856 रुपये का मालिक है। मोटे तौर पर सेनसेक्स ने हर साल अठारह प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि विकास दर दिखायी है। पर यह दर तब दिखती है, जब किसी ने 1979 से अब तक इन शेयरों को रखा हो। एकाध साल की अवधि के हिसाब से देखें, तो सेनसेक्स पिछले साल भी वर्तमान स्तर के आसपास टहल रहा था। यानी एक साल पहले सेनसेक्स में रकम लगाने वालों को कुछ खास हासिल नहीं है। यह अलग बात है इस बीच सेनसेक्स नौ हजार बिंदु के आसपास भी जा चुका है।

      पर सेनसेक्स कब नीचे जायेगा और कब ऊपर जायेगा, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं हो सकता, क्योंकि बड़ा से बड़ा ज्योतिषी भी यह नहीं बता सकता कि अमेरिका कब ईरान पर हमला कर देगा और कब तेल के भाव बढ़ जायेंगे या कब भारतीय बाजारों से विदेशी संस्थान अपने पैसे वापस खींचना शुरु कर देंगे। सेनसेक्स रोजमर्रा के हिसाब-किताब में इन सारे कारकों से प्रभावित होती है, पर दीर्घकाल में ऐसी सारी उठापटक होकर शांत हो जाती है। पर रोज सेनसेक्स देखने वाले अशांत हो जाते हैं।

      इसलिए वित्त मंत्रालय से अनुरोध है कि वह फौरन यह निर्देश जारी करे कि सेनसेक्स देखते समय किन सावधानियों का पालन जरुरी है। और सेनसेक्स देखना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, यह वैधानिक चेतावनी जगह-जगह दर्ज करा देनी चाहिए।

      आलोक पुराणिक एफ-1 बी-39 रामपस्थ गाजियाबाद-201011 मोबाइल-9810018799

June 7, 2007 - Posted by smartnivesh | Uncategorized | | No Comments Yet

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